कुंवर सिंह का जीवन परिचय | kunwar singh biography in hindi

कुंवर सिंह भारत के उन वीर पुरुषों में गिने जाते हैं । जिन्हें 1857 की क्रांति के लिए याद किया जाता है । इन्होंने इस क्रांति में बढ़-चढ़कर योगदान दिया और देश को अंग्रेज मुक्त कराने के लिए अपने प्राणों का भी निछावर कर दिया । उनके जीवन परिचय में हम यह जानने का प्रयास करेंगे की 1857 की क्रांति में कुंवर सिंह की क्या भूमिका थी । उनका बचपन कैसा था और ऐसी कई घटनाएं जिससे क्रांति को सफल बनाया जा सका और भारत को अंग्रेज मुक्त किया गया जानेंगे । इस चैप्टर के जरिए पूर्ण प्रयास किया जाएगा जिससे कि कुंवर सिंह के सभी महत्वपूर्ण घटनाओं को लेख में रूपांतरित किया जा सके । Kunwar Singh Biography In Hindi लेख का निर्माण भावनात्मक व इतिहास में हुई घटनाओं को मध्य नजर रखते हुए निर्मित किया गया ।


हम भारतवासी अपने इतिहास को धीरे धीरे भूल गए हैं । अतः यह लेख एक बहादुर पुरुष के विषय में है । और इनके जीवन चरित्र को जान करके आप का भी देश के प्रति लगाव बढ़ जाएगा । देश की आजादी की लड़ाई के लिए इन्होंने अपने प्राणों की आहुति दे दी । बला ऐसे वीर पुरुष को बुला देना इतिहास को शोभा नहीं देता है । जब तक कि भारत की पीढ़ियां और 1857 की क्रांति का नाम याद रखा जाएगा । तब तक वीर कुंवर सिंह का नाम भी जोड़ा जाएगा क्योंकि इस 80 साल के व्यक्ति ने अंग्रेजों से लोहा लेते हुए भारत के कई हिस्सों में उठ रहे क्रांति को बढ़ाने का काम किया जिससे भारत को आजादी मिल सकी ।


भारत के एक छोटे से हिस्से जगदीशपुर में आजादी का लौह स्तंभ स्थापित किया । उसके पश्चात इन्होंने भारत के और भी कई जिले जैसे कानपुर, बांदा, लखनऊ, रीवा, रोहतास, आजमगढ़ जैसे राज्यों को ब्रिटिश शासन प्रणाली से मुक्त कराया । 1857 की क्रांति के पश्चात वीर बहादुर कुंवर सिंह का नाम भारतीय इतिहास के सुनहरे अक्षरों में लिखा जाने लगा । चलिए फिर जानने का प्रयास करते हैं वीर कुंवर सिंह की सभी महत्वपूर्ण घटनाएं क्या थी ।


वीर कुंवर सिंह का जीवन परिचय (Biography of Veer Kunwar Singh )


कुंवर सिंह के बहादुर के किस्से जगदीशपुर से लेकर आपको बांदा तक के बच्चों बच्चों से सुनाई देंगेवी। इन्होंने अपनी मृत्यु के आखरी वक्त तक अंग्रेजों से लोहा लिया । वह अपने जिंदा होने तक अंग्रेजों को लोहे के चने चबाते रहें हालांकि अंग्रेजों ने कई बार उन्हें मारने का प्रयास किया लेकिन असमर्थ रहे । आज भी ऐसे कई प्रश्न हैं ? जो कि लोग जानना चाहते हैं जैसे क्या यह शुरू से ऐसे थे ? 1857 की क्रांति में इन्होंने क्यों भाग लिया ? इनका पारिवारिक जीवन कैसा था ? बचपन कैसा था ? ऐसे बहुत सारे सवाल जो आज के लोग जानना चाहते हैं । उन सभी का संग्रहण इस लेख में किया गया । चलिए फिर विस्तार पूर्वक समझते हैं ।


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कैसा रहा उनका वीर कुंवर सिंह का बचपन ? (How was his Veer Kunwar Singh’s childhood? )


वीर कुंवर सिंह का पालन पोषण एक राजपूताना परिवार में हुआ। कुंवर एक छोटी सी रियासत के सुल्तान के पुत्र थे । उन्होंने बचपन से ही तीर कमान, घुड़सवारी, युद्ध कौशल जैसी क्रियाओं में योगदान देते रहें । वह अपने राज्य जगदीशपुर में बेहद खुशी का माहौल रखते थे । फिर ब्रिटिश शासन प्रणाली ने भारतीय संस्कृति में कदम रखा । और धीरे-धीरे यह भारत के बुनियाद को खोखला करना शुरू कर दिया । हालांकि तब तक वीर कुंवर सिंह बहुत ही छोटे थे। और उन्हें तब ब्रिटिश शासन प्रणाली की रणनीति के विषय में पता नहीं था । लेकिन जैसे जैसे वह बड़े होते गए ब्रिटिश शासन प्रणाली ने अलग अलग कर लगा कर किसानों तथा जमींदारों का जीना दुश्वार कर दिया ।


अंग्रेजों के प्रति बढ़ने लगा आक्रोश (Growing resentment towards the British )


वीर कुंवर सिंह अब एक हष्ट पुष्ट पुरुष और समझदार व्यक्ति बन चुके थे । और उन्होंने धीरे-धीरे ईस्ट इंडिया की कंपनी की रणनीतियों को समझ लिया था । अंग्रेजों ने भारत में उपस्थित सभी राज्यों को लड़ाने और फूट डालो राज करो की नीति से अपने राज्य की स्थापना की । और वह बहुत ही सफल भी रहे । उन्होंने धीरे-धीरे पूरे भारत पर कब्जा कर लिया । तथा मुगलिया वंश से लेकर राजपूताना वंश तक सभी अंग्रेजों के अधीन हो गए । शुरू से वीर कुंवर सिंह इन सब चीजों से वाकिफ हो रहे थे । 1857 की क्रांति कोई 1 दिन की क्रांति नहीं थी । यह लगातार कई वर्षों से चल रहे आक्रोश का नतीजा था ।


अंग्रेजों ने सभी किसानों के ऊपर तथा जमींदारों को ऊपर कर लगाना शुरू कर दिया । जिससे जगदीशपुर की किसान और जमींदार जमींदारों का आक्रोश अंग्रेज के प्रति बढ़ने लगा । तथा अब वीर कुंवर सिंह 80 वर्ष के हो चुके थे । और 1857 का समय आज क्या था । जगह-जगह क्रांति भड़कने लगी कानपुर में नाना राव, रानी लक्ष्मी बाई ने अंग्रेजों के प्रति आंदोलन तथा युद्ध छेड़ दिया था । फिर भारत के अलग-अलग जगहों पर युद्ध होना शुरू हो गया । अतः अंग्रेजों के प्रति आक्रोश के चलते जगदीशपुर में भी युद्ध की आंधी चलने लगी और कुंवर सिंह अंग्रेजों से लड़ने का फैसला बना कर लिया । इन्होंने जमींदारों तथा किसानों की एक बड़ी टोली बनाई ।


कुंवर सिंह द्वारा जगदीशपुर तथा आजमगढ़ का आजाद होना (Independence of Jagdishpur and Azamgarh by Kunwar Singh )

कुंवर सिंह 80 साल की होने के साथ-साथ एक सूझबूझ और सलाहकार युद्ध रणनीति में माहिर थे । उन्होंने अपने प्रदेश में उपस्थित हिंदू तथा मुसलमानों को एकत्रित किया । और उन्हें युद्ध कौशल में निपुण करने के पश्चात हथियारों के साथ अपनी टोली बना ली । उन्होंने सर्वप्रथम विद्रोह जगदीश के “आरा” से शुरू किया । और इस आंधी को उठते देख अंग्रेज तिलमिला गए । उन्होंने सैनिकों की एक टुकड़ी भेजें जिससे कुंवर सिंह के लोगों ने मिलकर उस टुकड़ी को नेस्तनाबूद कर दिया । और कुमार सिंह के लोग लगातार आगे बढ़ते रहें । साथ ही में उन्होंने आजमगढ़ पर उपस्थित सैनिकों पर हमला करके उसे आजाद करवा लिया । कुंवर सिंह की बहादुरी के लिए 81 दिन तक आजमगढ़ को आजाद कराना उनकी सबसे बड़ी उपलब्धियों में शामिल है ।


उनका विद्रोह का सिलसिला चलता रहा । और उन्होंने जगदीशपुर में क्रांति को हवा देना शुरू कर दिया । उधर और अन्य शहरों में नाना पेशवा राव, तात्या टोपे, टीपू सुल्तान ने मिलकर अंग्रेजों से लोहा लेते हुए वीर कुंवर सिंह का भी साथ दिया । तथा सैन्य टुकड़ियों के साथ वीर कुंवर सिंह टीपू सुल्तान के सहभागी बने । रणनीति के साथ उन्होंने अंग्रेजों पर हमला किया । यह विद्रोह लगातार कुछ दिन तक चलता रहा । उसके पश्चात कुंवर सिंह अपने शहर जगदीशपुर लौट गए और वहां पर क्रांति को जारी रखा । 1857 की क्रांति के चलते अंग्रेज युद्ध को संभालने में असमर्थ है । क्योंकि जगह जगह पर विद्रोह शुरू हो गया था । और कुछ समय बाद उन्हें जगदीशपुर को भी आजाद करना पड़ा ।


विद्रोह के चलते शहर पर चलाया गया मुकदमा (The city was prosecuted for the rebellion )

भारत के इतिहास में पहली बार ही हुआ क्या होगा कि किसी शहर पर मुकदमा चलाया गया । उसका कारण 80 साल का बुजुर्ग वीर कुंवर सिंह था । क्योंकि उन्होंने अलग-अलग लोगों को एकत्रित करके आरा शहर पर आक्रमण कर दिया । जिसमें अंग्रेज के कई सिपाही और उच्च पदाधिकारी मारे गए । जिसके चलते ब्रिटिश शासन प्रणाली ने आरा शहर के लोगों पर मुकदमा चला दिया । जिसमें 6 अगस्त 1857 को ड्रम हेड कोर्ट मार्शल के तहत सबूतों तथा गवाहों के आधार पर आरा शहर के 16 व्यक्तियों को फांसी की सजा दे दी गई । जिसमें वीर कुंवर सिंह के कई साथी तथा वकील भी शामिल थे ।


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पूरा नाम (full name)बाबू वीर कुंवर सिंह
जन्मतिथि (date of birth)नवंबर 1777
जनस्थान (birth place)जगदीशपुर
म्रत्यु की तारीख (date of death)26 अप्रैल 1858
क्यो जाना जाता (why known)1857 मे स्वतंत्रता सेनानी के लिए
आजादी के मुख्य शहर (main cities of independence)जगदीशपुर, आजमगढ़
माता (mother)महारानी पंचरतन
पिता (father)बाबू साहबजादा सिंह
भाई (brother)हरे कृष्ण, अमर सिंह


एक झलक निजी जिंदगी पर (A Glimpse On Personal Life )


कुंवर वीर सिंह का जन्म नवंबर 1777 में बिहार के भोजपुर जिले के एक छोटे से गांव जगदीशपुर में राजपूताना परिवार में जन्म हुआ था । इन्हें 1857 की क्रांति में अंग्रेजो के खिलाफ जंग के लिए जाना जाता है । इनके पिता “बाबू साहबजादा सिंह” जगदीशपुर रियासत के एक प्रसिद्ध जमींदार थे । और इनकी माता महारानी “पंचरतन देवी” साधारण गृहणी रही हैं । वीर कुंवर सिंह युद्ध कौशल में पारंगत थे । राजपूताना परिवार में जन्म लेने की वजह से उनके पास जागीर का भंडार था । पिता की मृत्यु हो जाने के पश्चात जगदीशपुर का कार्यभार कुंवर सिंह पर आ गया । और उन्होंने भली-भांति अपनी रियासत को चलाया । उनकी दो भाई “हरे कृष्णा” और “अमर सिंह” वीर कुंवर सिंह के बहुत ही अच्छे सहभागी बने । और उन्होंने 1857 की क्रांति में अपने भाई कुंवर सिंह का साथ निभाया ।


जमींदार होने की वजह से ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा लगाए गए कर की वजह से कुंवर सिंह का खजाना भी धीरे-धीरे कम होता जा रहा था । अतः परिणाम स्वरूप उनका आक्रोश अंग्रेजों के प्रति बढ़ता गया । जो कि फिर बाद में एक क्रांति का रूप धारण कर चुकी थी । संपन्न परिवार में पैदा होने की वजह से इनका विवाह सिसोदिया राजपूताना शासक फतेह नारायण की पुत्री के साथ हुआ जोकि बिहार के एक बहुत बड़े जमींदार तथा महाराणा प्रताप के वंशज भी थे ।


बिहार की एक महिला से प्रेम तथा मस्जिद का निर्माण (Love with a woman from Bihar and construction of a mosque )


उन दिनों मुजरा काफी प्रसिद्ध हुआ करता था । और वीर कुंवर सिंह मुजरा के बहुत ही शौकीन थे । बिहार की एक तबायत धरमन बाई का मुजरा देखने जाया करते थे । इतिहास की मानें तो कहा जाता है कि इन दोनों का प्यार उसी मुजरा के दौरान शुरू हो गया । और धरमन बाई और कुंवर एक दूसरे से प्यार करने लगे और अंत में उन्होंने शादी भी कर ली । आपको बता दें कि धरमन बाई और करमन बाई दो बहने हुआ करती थी । जो कि बिहार के एक छोटे से शहर जगदीश के एक नुक्कड़ में मुजरे का कार्यक्रम किया करती थी । वीर कुंवर सिंह उनके प्रेम में इतना पागल हो गए हैं । कि उन्होंने करमन बाई के नाम पर एक टोला बसा डाला । जो कि आज भी बिहार के जगदीशपुर में उपस्थित है । वह धरमन बाई से इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने धरमन चौक का निर्माण करवा दिया । तथा उन्हीं के नाम पर एक मस्जिद भी बनवा दी । जो कि आज भी जगदीशपुर उसके उस छोटे से गांव में उपस्थित है ।


मंगल पांडे के नेतृत्व में लड़ा गया युद्ध (War fought under the leadership of Mangal Pandey )


1857 की क्रांति में मंगल पांडे को एक महत्वपूर्ण स्वतंत्रता सेनानी के रूप में देखा जाता है । क्योंकि इन्होंने अंग्रेजो के खिलाफ लड़ते-लड़ते अपने प्राणों को त्याग दिया । और इनके बलिदान को भुलाया नहीं जा सकता है । वीर कुंवर सिंह ने मंगल पांडे के नेतृत्व में भी युद्ध किया । जिसका परिणाम विजय रहा की वह उस युद्ध को जीत का है । कुंवर सिंह एक चतुर और कुशल योद्धा थे । जिन्होंने भारत के अलग-अलग कोने में उठ रही ज्वाला को अपने साथ मिलाने का पूर्ण प्रयास किया । कानपुर की रानी लक्ष्मीबाई तथा नाना राव से हमेशा सहमति में रहे थे । वह लखनऊ, गाजियाबाद, बनारस, रीवा अलग-अलग जगहों पर दौरा करते रहते थे । और छोटी-छोटी कड़ियों को बढ़ाने का कार्य करते थे । कुंवर हमेशा मंगल पांडे के करीब रहे । और बलिया में हुए युद्ध को उन्होंने मंगल पांडे के नेतृत्व में लड़ा जिसमें उन्होंने कुछ साथियों के साथ अंग्रेजी सरकार के सैनिकों को धूल चटा दी । अब अंग्रेजी शासन प्रणाली वीर कुंवर सिंह से बहुत ही परेशान हो गई थी । और उन्हें मारने का आदेश तक दे दिया गया था ।


वीर कुंवर सिंह पर ब्रिटिश शासन प्रणाली द्वारा लगाए गए आरोप (Veer Kunwar Singh was accused by the British system of governance )

  • कुंवर पर ब्रिटिश शासन के कई अधिकारी तथा सेना में उपस्थित जवानों को मार डालने का आरोप लगाया गया ।
  • उन्हें आरा में उपस्थित न्यायालय को पूर्ण रूप से घेरने तथा विद्रोह करने का आरोप लगा
  • देश की शांति तथा ब्रिटिश शासन प्रणाली को भंग करने तथा उनके नियमों को ना मानने का भी आरोप थोपा गया ।
  • 6 अगस्त 1857 में जब आरा के लोगों को सजा सुनाई जा रही थी तभी सारी जनता को भड़काने का आरोप भी लगा ।
  • ब्रिटिश शासन प्रणाली द्वारा चलाई गई कर नीति को ना मानने कर प्रणाली को बाधित करने का आरोप अंग्रेजों द्वारा लगाया गया ।
  • इन्हीं आरोपों के चलते अंग्रेजी सरकार ने वीर कुंवर सिंह को मारने का हुक्म दे दिया था जिसके जिसके चलते वीर कुंवर सिंह हमेशा अंग्रेजी सैनिकों से लड़ा करते रहते थे ।


वीर कुंवर सिंह की मृत्यु (Veer Kunwar Singh’s death )


युद्ध नीति तथा रणनीति में माहिर कुमार सिंह अंग्रेजों के कट्टर दुश्मन बन चुके थे । अतः ब्रिटिश शासन का एक सिपाही डग्लस कुंवर सिंह के पीछे हाथ धोकर पड़ गया था । उसने अपनी सेना की टुकड़ी तैयार की । डग्लस को सूचना मिली कि कुंवर सिंह अपने कुछ साथियों के साथ गंगा नदी को पार कर रहे हैं । अतः डग्लस अपनी सेना लेकर गंगा नदी के पास पहुंच गया । हालांकि कुंवर सिंह के सभी साथी गंगा नदी को पार कर चुके थे । और अंत में कुंवर सिंह की कश्ती बची थी । जिसमें कुंवर सिंह तथा उसके कुछ साथ ही सवार थे । डगलस ने उस कश्ती पर अंधाधुंध फायरिंग करवा दे । जिससे एक गोली वीर कुंवर सिंह की बांह पर जा लगी । अतः उस शोर में वीर कुंवर सिंह ने एक और गंगा की तरफ मुख किया और तलवार की धार से जिस बाह में गोली लगी थी । उसको काट के गंगा में समर्पित कर दिया । क्योंकि उन्हें पता था गोली लगने के पश्चात जहर फैलेगा । इस कारण उन्होंने ऐसा किया था ।


गोली लगने तथा हाथ कटने के पश्चात कुंवर सिंह अपने महल लौट आए । जहां उन्होंने महज 3 दिन ही बिता सकें। उसके पश्चात 26 अप्रैल 1858 में वीर कुंवर सिंह का देहांत हो गया । एक प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी का उस दिन अंत हो गया । हालांकि वीर कुंवर सिंह द्वारा जलाई गई चिंगारी अब पूरे देश में आग का रूप धारण कर चुकी थी । और उसने ईस्ट इंडिया को खाक में मिला दिया । जिससे अंग्रेजों को भारत छोड़कर जाना पड़ा ।


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वीर कुंवर सिंह की उपलब्धियां (Achievements of Veer Kunwar Singh)


  • उन्हें भारत के इतिहास में एक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी के रूप में याद किया जाता है । यह भी उनकी एक बड़ी उपलब्धि है ।
  • उनकी वीरता और इतिहास में किए गए कार्यों की वजह से उन्हें भारत सरकार द्वारा 13 अप्रैल 1996 में कुंवर सिंह की याद में एक स्टैंप जारी किया गया ।
  • ब्रिटिश इतिहासकार होम्स ने कुंवर सिंह के विषय में लिखा “उस 80 साल के बूढ़े ने ब्रिटिश सरकार की न्यू हिला के रख दी थी । यदि वह जवानी के दिनों में होता तो यकीनन 1857 से पहले ही भारत को ब्रिटिश सरकार से आजादी मिल जाती”
  • बिहार के जगदीशपुर में बीच सड़क पर एक चौक पर वीर कुंवर सिंह का विशाल मूर्ति उनकी उपलब्धि में शामिल है ।
  • जगदीशपुर के बच्चे बच्चे आज भी वीर कुंवर सिंह की गाथा को गाते हैं । और खंडहर पड़े उनके महल कुंवर सिंह की कहानी को बयां करते हैं ।
  • इस भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी के ऊपर कई प्रसिद्ध पुस्तकों का निर्माण किया गया । जिसमें सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण “काली किंकर दत्त” द्वारा लिखित “बायोग्राफी ऑफ कुंवर सिंह एवं अमर सिंह” है जिसे 1957 में प्रकाशित किया गया ।
  • भारत के एक नेशनल ट्रस्ट ने कुंवर सिंह तथा 1857 नामक पुस्तक का निर्माण किया । जिसके लेखक डॉक्टर सुभाष शर्मा, अनंत कुमार सिंह तथा जवाहर पांडे थे ।
  • कुंवर सिंह की जिंदगी पर बनी एक फिल्म को डायरेक्टर “प्रकाश झा” ने एक धारावाहिक का रूप दे दिया । इस धारावाहिक के विजय प्रकाश के लेखक थे । सतीश सिंह ने कुंवर सिंह के रूप को चित्रित किया । जिसे साल 1992 में रिलीज किया गया ।


वीर कुंवर सिंह से जुड़े कुछ लघु किस्से (Some short stories related to Veer Kunwar Singh )


  • जब कुंवर सिंह 1857 की क्रांति में भाग तब वह 80 वर्ष के एक बुजुर्ग आदमी हो चुके थे । उस अवस्था में वह चाहते तो अपनी संपत्ति का पूर्ण रूप से लाभ उठाते घर पर ही आराम करते हैं । लेकिन उन्होंने क्रांति में भाग लिया और भारत को ब्रिटिश शासन से मुक्त कराया ।
  • कुंवर सिंह के बारे में यह भी कहा जाता था । कि वह युद्ध से पहले भाईचारा में विश्वास करते थे । और कई ब्रिटिश अधिकारी भी उनके मित्र थे । लेकिन ब्रिटिश की शासन प्रणाली ने उन्हें एक क्रांतिकारी सैनिक बना दिया ।
  • उन्होंने बीबीगंज की अपनी सफलता को 2 अगस्त 1857 ईसवी में प्राप्त की । शहर आरा के बाद उन्होंने बीबीगंज को भी अपने कब्जे में कर लिया और उसे स्वतंत्र घोषित कर दिया ।
  • कुंवर सिंह की मृत्यु के पश्चात अंग्रेजी हुकूमत ने कुंवर सिंह के महल पर हमला करके उसे खंडहर कर दिया । तथा उसमें मिली संपत्ति को जप्त कर लिया । आज भी जगदीशपुर में पड़े खंडहर कुंवर सिंह की हालिया बयान करते हैं ।
  • आपको बता दें कि उनके जीवन परिचय पर कई कहानियां और कविता बनाई गई जो कि बच्चों को उनकी बहादुरी सुनाने के लिए पर्याप्त सामग्री थी ।

वीर कुंवर सिंह पर रचित कविता (Poem on Veer Kunwar Singh)

हालांकि इस कविता का निर्माण स्वयं लेखक के द्वारा नहीं किया गया है । इस कविता का श्रेय बनाने वाले को जाता है लेखक अपने प्रिय पाठकों के लिए केवल और केवल इसका निवारण कर रहा है वह कविता इस प्रकार है –


आज कहानी एक सुनानी,
वीर जिसकी थी अलग जिंदगानी,
जब देश के युवाओं का पुरुषार्थ
दम तोड़ रहा था,


80 बसत देख चुके बाबु कुवर का कर्तव्य,
उन्हे झकझोर रहा था,
उनकी कहानी उन्ही की जुबानी,
वीर जिसकी थी अलग जिदगानी|
राजा क्या सुख पाने बने हो,
जनता को मरवाने बने हो,


ऐ देशवासियो क्या हम इतने नरम है,
हजारो साल की सस्कृति में क्या इतना ही दम है|
मुट्ठी भर गोरे हमे लूट जा रहे है,
और राजाओ के आत्मस्वाभिमान डूबते जा रहे हैं|


क्या ये प्रजा हमारी नही?
क्या महल के बाहर हमारी जिम्मेदारी नही|
अग्रेजो को टुकड़े खा रहे हो ,
आर्यवर्त का नाम डूबा रहे हो,
कुत्ते कहे जाते है ऐसे लोग, राजा नही कहलाते है,
स्वाधीनता छोड़ने वाले, महल में रह भी दास हो जाते हैं|


आखरी शब्द (last word)

हालांकि इस चैप्टर का अंत हो रहा है । लेकिन इस महान व्यक्ति का कभी अंत नहीं होगा । जब तक हमारा इतिहास है । हम इस महान व्यक्ति को याद करते रहेंगे । क्योंकि इन्हीं की वजह से आज भारत इस मुकाम तक पहुंचा है । और 1857 की जब भी क्रांति का नाम लिया जाएगा । उसमें कुंवर वीर सिंह का भी नाम जोड़ा जाएगा । वीर कुंवर भी एक स्वतंत्रता सेनानी थे । जिन्होंने 80 वर्ष की अवस्था में भारत के लिए अपने प्राण निछावर कर दिए ।


मैं एक लेखक होने के बावजूद भी इनके प्रति अपने सम्मान को कम नहीं कर सकता हूं । इनकी जीवन परिचय को पढ़ने और समझने के पश्चात मैं अपने भारत के इतिहास पर गर्व करता हूं । और यह उम्मीद करता हूं कि हमारे प्रिय पाठक भी अपने भारत के इतिहास को पढ़ने में दिलचस्पी दिखाएंगे और कुंवर सिंह के द्वारा किए गए कार्यों को जीवन में उतारेंगे । Kunwar Singh Biography In Hindi का यह लेख यही समाप्त किया जा रहा है |


कौन हैं वीर कुंवर सिंह और उन्हें 1857 की क्रांति के लिए क्यों याद किया जाता है ?


वीर कुंवर सिंह एक 80 साल के स्वतंत्रता सेनानी थे । जिन्होंने भारत के अलग-अलग राज्यों में उठ रहे अंग्रेजी शासन के विरुद्ध आक्रोश को बढ़ाने का कार्य किया । जिससे कि भारत को ईस्ट इंडिया कंपनी से मुक्त किया जा सकी । उन्होंने मृत्यु से पहले जगदीशपुर, आजमगढ़ आदि कई इलाकों को अंग्रेजी हुकूमत से आजाद करवाया ।


कुंवर सिंह का जन्म तथा मृत्यु कब और कैसे हुई ?


कुंवर वीर सिंह का जन्म नवंबर 1777 में बिहार के भोजपुर जिले के एक छोटे से गांव जगदीशपुर में राजपूताना परिवार में जन्म हुआ था । जब वह जहाजी बेड़ा को लेकर गंगा के उस पार जाने का प्रयास कर रहे थे तभी अंग्रेजी हुकूमत के जनरल डगलस ने उन पर अंधाधुंध फायरिंग कर दी । जिससे कि उनकी मृत्यु 26 अप्रैल 1858 को राज महल के सत्र में हुई थी ।


क्या वजह है जिससे कुंवर सिंह को आज भी एक स्वतंत्रता सेनानी के रूप में देखा जाता है ?


उनके द्वारा इतिहास में किए गए कार्यों को आज एक हीरो के रूप में वर्णित किया जाता है । और उन्होंने 1857 की क्रांति में भारत को आजाद करने के लिए अपने प्राणों को निछावर करना ।


आखिर क्यों अंग्रेजी हुकूमत ने कुंवर सिंह को मारने का हुक्म दे दिया था ?


80 साल के कुंवर सिंह ने अंग्रेजी हुकूमत की नाक में दम कर लिया । जगह जगह पर विद्रोह देखकर अंग्रेजी सैनिक तिलमिला उठे । और एक अदालती कार्यवाही के बाद वीर कुंवर सिंह पर अंग्रेजी हुकूमत के जरिए कई आरोप लगाए गए । जिसके बाद उन्हें मारने का हुक्म दे दिया गया ।


कुंवर सिंह के माता पिता और भाई बहन का क्या नाम था ?


कुंवर सिंह के पिता का नाम बाबू साहबजादा सिंह तथा माता का नाम महारानी पंचरतन और उनके दो भाइयों का नाम हरे कृष्ण तथा अमर सिंह था ।

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